HOW TO IMPROVE COMMUNICATION SKILLS (संचार कौशल कैसे बढ़ाएं)


संचार वह प्रक्रिया है जिससे हम अपने संदेशो को दूसरो तक पहुंचाते हैं। संचार से आपसी रिस्तो में नजदीकी आती है। आज हम चाहे किसी भी क्षेत्र में कार्य करे, अपने कार्य में निपुण होने के लिए संचार कौशल को विकसित करना जरूरी है। संचार कौशल को विकसित करने के लिए हर व्यक्ति में निम्न गुणों का होना आवश्यक है।

1. ध्यान से सुने

संचार कौशल का पहला कदम है सामने वाले को ध्यान से सुनें। सुनते समय ऐसा कुछ भी न करें जिससे आपका ध्यान बंटता हो - बातचीत के समय अपने बाल संवारना, या पेन से खेलना या पैर घुमाना या फिर अपने अगले जवाब के बारे में सोचना इत्यादि से आप कही जाने वाली बातों के कई महत्वपूर्ण अंश सुनने से वंचित रह जाते हैं। बोलने वाले को बीच में न टोकें और आधी अधूरी बात सुनकर बाकी के विषय में स्वतः धारणा बनाने से भी बचें।

2. आई कांटेक्ट बनाए रखें

बातचीत के दौरान हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि सामने वाला शख्स आपकी बात को ध्यान से सुने। इसके लिए हम अपनी आंखों के एक्सप्रेशन का यूज कर सकते हैं। ताकि सामने वाले शख्स को ऐसा न लगे कि आप सिर्फ एक तरफ ही फोकस कर रहे हैं। आई कांटेक्ट पर विशेष ध्यान दें। रोज सुबह-शाम योग करें व हरे फल व सब्जिओं का इस्तेमाल करें, इसके अलावा प्लेन पेपर पर ब्लैक पेन से एक छोटा बिंदु बनायें, जिसे रोजाना सुबह-शाम ध्यान से करीब आधे घंटे तक देखे इससे आपके आई कांटेक्ट में वृद्धि होती है।

3. सवाल पूछें

यदि कुछ समझ नही आये तो पूछें। यह सुनिश्चित करें कि आपने वही सुना और देखा है जो वक्ता कहना चाहता था।

4. सटीक बोले

जब आप बोलें तो यह ध्यान रखें कि सामने वाले को बात समझाने का दायित्व आपका है। इसलिए बोलने की रफ़्तार, उच्चारण इत्यादि ऐसा होना चाहिय कि श्रोता उसे आसानी से सुन व समझ सके। अत्यधिक तेज या धीरे बोलने से बचें, शब्दों का चुनाव श्रोता को ध्यान में रख कर करें। बिना बोलें, सिर्फ हाव भाव से ही हम बहुत कुछ कह जाते हैं। जब आप बोल रहे हों तो पूरा ध्यान अपने श्रोता पर रखें, उसके हाव भाव को देखें, यदि ऐसा लगे कि उसे पूरी तरह समझ में नहीं आ रहा तो पूछें कि क्या में आपको अपनी बात समझा पा रहा हूँ ?

5. निंरतर अभ्यास

संचार कौशल को विकसित करने के लिए निरंतर अभ्यास का होना जरूरी है। यह निंरतर अभ्यास तभी हो सकता है, जब हम अपनी दैनिक क्रियाओं में बातचीत स्पष्ट एंव सरल तरीके से करें। किसी भी परिचित एवं नए व्यक्ति से बात करने में शर्म महसूस न करें।

6. श्रोता का ध्यान आकर्षित करे

वार्तालाप के दौरान हमारा यही लक्ष्य होना चाहिए कि हम श्रोता का ध्यान अपनी ओर खींचें। हम श्रोता का ध्यान आंखों से आंख मिलाकर भी खींच सकते हैं।

7. आत्म विश्वास बनाए रखें

बातचीत के दौरान अगर हमारी सोच में साहस एवं विश्वास होगा तो हमारी बातचीत खुद ब खुद सकारात्मक होगी। हमें बोलते समय डर को भी दूर भगाना होगा।

8. स्पष्टता व मिठास

बातचीत के दौरान हमे शब्दो व वाक्यो में स्पष्टता लानी चाहिए। वाणी में सदा मिठास होनी चाहिए। अगर बात स्पष्ट न हो तो उसे पुनः स्पष्ट करना चाहिए। शब्दों व वाक्यों को व्यक्तिगत तौर पर स्पष्ट करना चाहिए। अपने व्यक्त्वि में उपरोक्त गुणों को समाहित कर हम अपनी संचार क्षमता को बढा सकते है और सफलता के नजदीक पहुंच सकते हैं।

9. भावनाओं पर काबू करें

यदि आपका सहयोगी अपने हिस्से का काम पूरा नही कर सका है तो उस पर चिल्लाने से समस्या का समाधान नही होगा।
सामने वाले को बताएं कि उसकी किस हरकत विशेष से समस्या है। व्यक्ति की नहीं, उसके कार्य की आलोचना करें।

10. आदान-प्रदान

 बातचीत के दौरान हमारा 45 प्रतिशत समय सुनने में गुजरता है। वहीं अधिकांश लोग बात सुनने को गंभीरता से नहीं लेते, जबकि सुनना कम्युनिकेशन का बेहद जरूरी हिस्सा होता है। सुनने की कला से जुड़ा पहला नियम है कि बोलने वाले को यह अहसास होना चाहिए कि उसकी बात ध्यान से सुनी जा रही है। इससे संबंधों में भी मजबूती आती है। औपचारिक वातावरण में मैनेजर की जिम्मेदारी होती है कि वह ऐसा माहौल तैयार करे, जिसमें प्रत्येक बोलने वाले को एहसास हो कि उसकी बात ध्यान से सुनी जा रही है। वहीं सुनने वालों की जिम्मेदारी होती है कि वह बोलने वाले की ओर पूरा ध्यान दें। सुनते समय ध्यान भटकने से बचने का तरीका है कि बोलने वाले के शब्दों को मन में दोहराते रहें, ताकि बातचीत से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु छूटें नहीं।

11. बॉडी लैंग्वेज

बातचीत में एक स्थान Body Language का भी होता है। याद रखें कि सुनने वाले की Body Language अक्सर बोलने वाले की निगाह में आ जाती है। सुनने वाला अपने बाजुओं को एक दूसरे से दूर रखे, सीट के किनारे पर बैठ कर या फिर बोलने वाले को एकटक देखते हुए अपनी एकाग्रता जाहिर कर सकता है। इसी तरह बीच-बीच में बोलने वाले की ओर देख कर मुस्कराना भी सकारात्मक संकेत देता है।

12. ध्वनि, भाषा और शब्दों का तालमेल

कम्युनिकेशन एक सीखने वाली कला है और अपने सहज भाव में ही यह सबसे अधिक प्रभावी दिखती है। उदाहरण के लिए स्वतः स्फूर्त तौर पर दी गई स्पीच का औपचारिक तौर पर दिए गए भाषण से अधिक असर होता है। बेशक एक असरदार कम्युनिकेटर के तौर पर अपने हुनर को चमकाने के लिए किसी को भी समय लगता है, परंतु सहज और प्राकृतिक कम्युनिकेशन के लिए किया गया अधिकाधिक अभ्यास अंततः काम आता है। असरदार कम्युनिकेशन व्यक्ति या परिस्थिति को समझने में मदद करता है। इसके जरिए आपसी मतभेद दूर होता है, भरोसा और आदर बढ़ता है। इसमें उच्चारित शब्द और भाव बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिनके जरिए रचनात्मक विचार पनपते हैं, समस्याएं सुलझती हैं और सहयोग बढ़ता है।

महत्वपूर्ण बिंदु

- सकारात्मक और स्पष्ट कम्युनिकेशन का एक रहस्य आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से भी जुड़ा होता है। अपने व्यक्तित्व के इन दोनों पक्षों को समझ कर कार्य में ही नहीं, जीवन के प्रत्येक पक्ष में सकारात्मक दृष्टिकोण से काम किया जा सकता है।
- कुशल कम्युनिकेशन स्किल अपने कहे पर अडिग रहने से भी मजबूत होती है। यह पक्ष आत्मविश्वास के जरिए मजबूत होता है।
- तनाव, अवसाद या क्रोध के समय कम्युनिकेशन असरदार नहीं होता। कार्यस्थल पर इन नकारात्मक पक्षों से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए।
- अपने सहकर्मी या बॉस की बात सुनते समय उसी समय दोहराने की आदत इस ओर इशारा करती है कि आपने उनकी बात को गौर से सुना और समझा है। इससे दोनों पक्षों को किसी किस्म की उलझन को सुलझाने में सहूलियत होती है।
- इसी तरह नॉन-वर्बल कम्युनिकेशन यानी शब्दहीन संवाद के दौरान Body Language, चेहरे के भावों, इशारों, आंखों के संपर्क, बैठने के तरीके, मांसपेशियों के तनाव और सांस लेने-छोड़ने को समझना भी कुशल कम्युनिकेशन का जरूरी अंश होता है।
- सार्वजनिक स्थानों, बसों, ट्रेन, कैफे, रेस्तराओं में बैठे लोगों को देख कर या मूक चलचित्रों के जरिए मूक संवाद को समझने का अभ्यास किया जा सकता है।
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